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कमीशनखोर सेन्ट जोसफ की प्रिंसिपल को गोला जूता ज्यादा पसंद

भोपाल (सैफुद्दीन सैफी) हर माँ बाप की इच्छा होती है की उनके बच्चे अच्छे स्कूलो मे पढे इसीलिए वो जी तोड़ मेहनत कर के रात दिन खून पसीना एक करके अपने बच्चो का एडमिशन तथाकथित कान्वेंट कल्चर के ईसाई मिश्नरी स्कूलो मे बच्चो को भेजते है, सेवा के नाम पर शिक्षा की दुकाने माइनॉरिटि स्कूल के नाम पर सी॰ बी॰ एस॰ सी॰ बोर्ड से मान्यता ले कर  संचालित इन  स्कूलो मे जहाँ मनमानी फीस वो भी एक साथ पूरे सत्र की तो वसूल कर ही ली जाती है, साथ ही पालको को ये भी जतला दिया जाता है॰ की उन्हे बच्चो का कोर्स कहा से लेना है, ड्रेस किस दुकान से लेनी है, और बच्चे को कोनसी दुकान से कौनसे ब्रांड का जूता लेकर पहना कर भेजना है। स्कूल की प्रिंसिपल के मुताबिक चिन्हित इन दुकानों पर जब पालक जाता है, तो उसकी जो  जेब कटती है उसका दर्द तो भुगतभोगी ही जान सकता है। मगर इन स्कूलो के संचालको को कोई फर्क नहीं पड़ता फर्क पड़े भी क्यो जब मंत्रालय मे बेठे कतिपय अफसर और पुलिस मुख्यालय मे पद्स्थ अधिकारियो का इन्हे खुला संरक्षण प्राप्त हो जिनके एक फोन पर सेन्ट जोसफ की प्रिंसिपल मेडम लिली का चेहरा पीला पड़ जाता हो डर के मारे भोपाल के ईदगाह स्थित सेन्ट जोसफ गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल को  भोपाल की जूतो की एक विशेष दुकान का जूता जो कि  गोला नाम से जाना जाता है, जोकि एक विशेष दुकान से ही खरीदा जाये तो उसकी कीमत 600 से लगा कर 900 रूपये होती है, जबकि ये ही जूता बाज़ार मे दूसरी दुकानों पर 300 से लेकर 500 रुपये तक आ जाता है, सेन्ट जोसफ की प्रिंसिपल एक विशेष दुकान का ही जूता क्यो पसंद करती है? क्यो की इससे खासतौर पर भोपाल की एक नामी गिरामी जूतो के कारोबार मे मशहूर कंपनी बनाती है इसी के जूते सेन्ट जोसफ मे बच्चो को पहन कर आना जरूरी  है, नहीं तो अगर किसी दूसरे ब्रांड का जूता दिखा पाँव मे तो बच्चो को पनिशमेंट मिलना तय है इस जूते से मेडम लिली को इतना लगाव इसलिए है, की हर साल ये कंपनी कमीशन के तौर पर प्रिंसिपल को और स्कूल मेनेजमेंट को लाखो रुपए इनयात करती है दूसरी तरफ बिचारे पालको की जेबे मुफ्त मे कट रही है जिससे देखने वाला कोई नहीं प्रदेश के शिक्षा विभाग मे बेठे अधिकारियों को कोई शिकायत भी करने जाओ तो उनका एक ही जवाब ये सी बी एस सी स्कूल है हमारे अंडर मे नहीं आते कह कर पल्ला छाड़ लेते है। (खबरे अभी और भी है इस शिक्षा की दुकान की पड़ते रहे लोकजंग

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