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आपेक्षाओ से भरे ..रिश्ते....

जब बात चली रिश्तों की तो मानवीय रिश्तों की बहुतायत है, संसार है तो रिश्ते भी है हम है अगर दुनिया मे तो वजह है एक जुड़ाव ,और वह जुड़ाव रिश्तों पर टीका है, मानवीय संवेदना और हम मनुष्य सिर्फ भावनाओ मे बहकर रिश्ते बनाते है और बनते है, कई रिश्तों मे बंध जाते है जरूरतों के मुताबिक एक दूसरे पर आश्रित, जरूरते प्यार बांधे रहती है एक दूजे से, अपने comfort zone मे हम रिश्तों का आंकलन करते है, जनाब इंसानी बुद्धि और मन भावनओं पर ही टिका है, कुछ परिपक्व रिश्ते अपवाद हो सकते है, यह अपनी अपनी राय हो सकती है, इंसानी रिश्ते सिर्फ अपेक्षाओं की वजह से
ही टूटते है, अत्यधिक सहजता और अत्यधिक दबाव,रिश्तों की मिठास को स्वतः कम कर देता है, कहते है न?..अति किसी भी चीज़ की अच्छी नही, थोडा रूहानी थोडा लड़ाई और प्यार रिश्तों को सहेजने के लिए काफी है. मानवीय रिश्ते ही नही यह कुदरत भी रिश्तों मे बंधी है देखिए ना..
आज मौसम कुछ अजीब सा है, धूल भरी हवाएँ चल रही ,गौर किया आपने कुदरत भी रिश्ते निभाती है हम मनुष्यो से और खुद के वातावरण से, चार मौसम गवाह है ,गौर करे तो कुदरत भी सन्तुलन चाहती है. अत्यधिक बारिश,सर्दी,गर्मी उसे असन्तुलित कर देती भूकम्प दरकती जमीन,भूस्खलन और तमाम प्राकृतिक आपदाएं नतीजा ही है असंतुलित होते नियमों का,और कुदरत के आपसी सहयोगी जैसे समन्दर ,हवाएँ पर्वत सब रुष्ट हो जाते और उनके रिश्ते दरक जाते है ठीक इंसानी रिश्तों की तरह,समय आ गया है की जब ब्रम्हांड मे हम सभी को साथ रहना ही है, तो आपस मे तालमेल सन्तुलित होना भी जरूरी है निष्पक्ष सरल कम अपेक्षा और मुख्य बात नुकसान न करने की प्रवृति
जैसे कुदरत ...
निष्पक्ष होकर ,बंजर जमीन पर धूल और तेज आंधी से बीज कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है,(dispersal of seed) नम करती बारिश नई कोम्पल से हरीतिमा प्रदान करती धुप बारिश सर्दी गर्मी से हमे अवगत कराती यह कुदरत निस्वार्थ रूप से रिश्ते ही निभा रही है और निभाती रहेगी सदियों से अंनत तक, ....

सुराख़ हो गए रिश्तों में इस कदर साहिब....
मोहब्बत रिस रही है जरा जरा करके......!!

स्वरा"सुरेखा अगल

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