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मप्र मे महिला शराब दुकान खोलने के मायने

भोपाल। बेशक मध्यप्रदेश मे वक्त बदलाव का हैं, लेकिन यह बदलाव इतना खुमार भरा होगा, यह अंदाजा कम ही लोगो को होगा। मध्यप्रदेश सरकार की नई शराब नीति से राज्य के शराबियों मे तो हर्ष हैं ही, अब महिलाओ मे भी सुलभ-संदेश गया हैं। ताजा खबर हैं कि राज्य सरकार महिलाओ की जरूरत के मद्देनजर प्रदेश मे महिलाओ के लिए अलग से शराब की दुकाने खोलने जा रही हैं। एक प्रतिष्ठित अँग्रेजी अखबार मे छपी खबर के मुताबिक सरकार की कोशिश यही हैं कि महिलाओ को शराब खरीदने मे कोई दिक्कत न हो। शुरू मे भोपाल,इंदौर जबलपुर और ग्वालियर मे एक-एक दुकान खोली जाएगी। इस दुकानों पर वाइन और व्हिस्की के वे सभी ब्राण्ड्स मिलेंगे जो महिलाएँ पसंद करती हैं। यह दुकाने मुंबई,दिल्ली और अन्य मेट्रो सिटी की तर्ज पर खुलेंगी। क्वालिटी बनाए रखने के लिए विदेशी शराब ही बेचने की इजाजत होगी। जरूरी नहीं की सारे ब्रांड मप्र मे रजिस्टर्ड ही हो। उन पर कोई अतिरिक्त डयूटी भी नहीं वसूली जाएंगी। उम्मीद हैं कि इससे महंगी शराब का कारोबार बढ़ेगा, लोगो की जिंदगी मे सुरूर आएगा और सरकारी खजाना तेजी से बढ़ेगा। हालांकि मध्यप्रदेश जैसे विकासशील राज्य मे कितनी महिलाएँ शराब पीती हैं उसका कोई अलग से आकंडा उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन समूचे भारत मे महिलाओ मे शराबखोरी की लत बढ़ रही हैं , यह सच हैं। पिछले साल एक सरकारी सर्वे के हवाले से बताया गया था कि भारत मे 16 करोड़ लोग शराब के शौकीन हैं। इनमे  10 साल के बच्चो से लेकर 75 साल के बुजुर्ग तक शामिल हैं। विश्वस्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट बताती हैं कि भारत मे शराब की खपत पिछले तीन साल मे 38 फीसदी बढ़ी हैं। शराब की लत या शौक समाज और खासकर महिलाओ मे क्यो बढ़ रहा हैं, इस पर अब शोध  होने लगा हैं। क्योकि महिलाओ का सार्वजनिक रूप से शराब पीना तो भारतीय संस्कृति मे वर्जित माना जाता रहा हैं, लेकिन अब सोच और जीवन शैली तेजी से बदल रही हैं। महिलाएँ बेझिझक शराब खरीदने और पीने लगी हैं। इसके पीछे आर्थिक-सामाजिक कारण हैं। महिलाओ मे शराब के बढ़ते चलन के पीछे सामाजिक दवाब, मानसिक तनाब, कुछ अलग तरह से जीने की चाहत, मौज-मस्ती, आर्थिक स्वावलंबन और इस क्षेत्र मे भी पुरुषो से बराबरी करने की तमन्ना हैं। लगता हैं मध्यप्रदेश सरकार ने महिलाओ के बदलते मानस और शराब के प्रति आकर्षण को ध्यान मे रखते हुये राज्य मे इनके लिए अलग से दुकान खोलने की पहल की हैं। एक अध्ययन के मुताबिक इस मामले मे महिलाओ की पसंद देशी के बजाए विदेशी दारू हैं, जैसे कि वाइन, जिन, वोदका आदि। वैसे तो लोग शराब कई कारणो से पीते हैं। कुछ लोगो के लिए यह “दवा” हैं तो समाज के लिए यह बड़ा दर्द हैं। इसका विस्तार अब महिलाओ तक होने से समस्या और जटिल होगी। हो सकता हैं सरकार के इस फैसले से सांस्कृतिक शुद्धतावादियो को गहरी ठेस लगे, लेकिन वक्त का बदलाव जीवन के हर क्षेत्र मे हैं, ऐसे मे सरकारो ने सुरापान को हतोत्साहित करने कि जगह इसे घर घर पहुँचाने का तय कर लिया हैं। ऐसे मे महिलाओ को अलग दुकानों के जरिए शराब मुहैया कराना महिला सशक्तिकरण की दिखा मे उठाया गया कदम है या फिर सरकार महिलाओ मे शराबखोरी के बढ़ते ट्रेंड को और हवा देना चाहती हैं, यह समझना मुश्किल हैं। वैसे शायराना तबीयत मे तो यह शराब को शबाब के और करीब लाना हैं। किसी ने कहा भी हैं-

“न हो शबाब तो कैफियत-ए-शराब कहाँ 

न हो शराब तो कैफियत–ए-शबाब कहाँ” 

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