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धर्म के और कितने जानलेवा होने पर उससे थकेंगे लोग?

धर्म का पहला हमला सोचने- समझने की शक्ति पर होता है। और इसके साथ-साथ ही लोगों की सामान्य समझबूझ जवाब दे जाती है, विश्लेषण करने की ताकत खत्म हो जाती है, और दिमाग पर जोर डालने वाली तमाम चीजें खत्म हो जाती हैं। दरअसल धर्म के बाद इनमें से किसी की भी कोई जरूरत भी नहीं रहती। धर्म जिस आस्था की तरफ लोगों धकेलता है, उस राह पर तो सोचने की ताकत एक बड़ा रोड़ा ही हो सकती है। इसलिए धर्म असरदार तभी होता है जब उसे मानने वाले लोग दिमाग के किसी भी तरह के इस्तेमाल के खिलाफ खड़े हो जाएं। 

 

अभी नाइजीरिया से खबर है कि वहां एक चर्च के कब्जे से पुलिस ने 77 लोगों को छुड़ाया है। इनमें 54 बालिग थे, और 23 बच्चे, जिन्हें सम्मोहित करके चर्च के तहखाने में कैद करके रख लिया गया था, और वहां का पादरी उन्हें भरोसा दिलाते जा रहा था कि यीशु मसीह लौटकर आने वाले हैं। ये सारे लोग आस्थावान और धर्मालु ईसाई थे, और चर्च जाने वाले, ईश्वर को मानने वाले लोगों के लिए इससे बड़ा और कौन सा मोह हो सकता है कि ईश्वर आने वाले हैं, किसी भी पल आने वाले हैं, और उन्हें इंतजार करना चाहिए। जब चर्च में कैद और सम्मोहित ऐसे बच्चों में से कुछ के मां-बाप ने पुलिस में शिकायत की तो पुलिस ने वहां पहुंचकर बलपूर्वक इन लोगों को छुड़ाया। इनमें से कई बच्चे तो जनवरी से ही चर्च में आए हुए थे, और तब से यीशु मसीह का रास्ता देख रहे थे। बहुत से बच्चों ने स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी थी, और इस चर्च के तहखाने में कैद रहकर वे इंतजार कर रहे थे कि पादरी कब यीशु मसीह को लेकर आएंगे। पढ़ाई-लिखाई में बड़े होनहार बच्चे भी पढऩा छोड़ चुके थे, और वे यीशु मसीह से मुलाकात को पढ़ाई से अधिक महत्वपूर्ण मान रहे थे। पहले उन्हें अप्रैल के महीने में इस आगमन की बात कहकर जनवरी से रोककर रखा गया था, और जब अप्रैल निकल गया तो अगली तारीख सितंबर की दी गई थी। 

 

यह पूरा सिलसिला बिना हिंसा के भी भयानक है, क्योंकि यह ईश्वर या उसके एजेंट, किसी पादरी की बात को आंख मूंदकर मान लेने की एक गुलाम मानसिकता पैदा कर चुका है। इक्कीसवीं सदी के बाइसवें बरस में जब विज्ञान अपनी अपार ताकत साबित कर चुका है, जब दुनिया के विकसित देशों में धर्म का नाम का पाखंड किनारे होते चल रहा है क्योंकि लोग नास्तिक होते जा रहे हैं, ऐसे में एक पिछड़े हुए गरीब देश में चर्च का पादरी पौन सौ लोगों को महीनों तक गुलाम बना सकता है कि ईश्वर आने वाले हैं, तो इसकी जगह कोई हिंसक पादरी किसी दूसरे धर्म वाले का गला भी काटने को कह सकता है। अभी हिन्दुस्तान इसी पर उबल रहा है कि मोहम्मद पैगंबर के अपमान की हिमायत करने वाले एक हिन्दू दर्जी का गला दो मुस्लिमों ने इसी बात के लिए काट दिया। एक दूसरा मामला भी इसी किस्म का हुआ बताया जाता है, जिसकी जांच चल रही है। हिन्दुस्तान में 140 करोड़ से अधिक गले हैं, और गिनती में कम से कम उतने ही चाकू या दूसरे औजार भी होंगे। अगर ईश्वर के नाम पर लोगों को उकसाकर और भडक़ाकर इस हद तक आग लगाई जा सकती है कि लोग एक-दूसरे के गले काटने को तैयार हो जाएं, तो यह इंसानी साजिश और धर्म की धारणा, इन दोनों का मिलाजुला करिश्मा है जो कि किसी भी देश या समाज को खत्म करने की ताकत रखता है। 

 

जिन घटनाओं से यह अच्छी तरह साबित हो जाना था कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है, धर्मान्ध लोग उन घटनाओं के वैसे पहलुओं को अनदेखा करते चलते हैं, और धर्मान्धता को बढ़ाने वाले पहलुओं को बढ़ाते चलते हैं। आज हिन्दुस्तान में धर्म का सामाजिक योगदान सिर्फ नफरत फैलाने वाले एक हथियार जितना रह गया है, और धर्म से जुड़े हुए जिस ईश्वर की महिमा गाई जाती है, वह ईश्वर अपने नाम के हिंसक और नफरती इस्तेमाल का मानो मजा लेते बैठा है। आज की तमाम घटनाएं यह साबित करती हैं कि अगर ईश्वर का कोई अस्तित्व हुआ होता, तो वह या तो पूरी ताकत से नफरती-हिंसक लोगों पर टूट पड़ता, या फिर अपनी लाचारी में खुदकुशी कर लेता। लेकिन इनमें से कुछ भी होते नहीं दिख रहा है, हत्या भी ईश्वर के अनुयायी कर रहे हैं, और आत्महत्या भी वे ही लोग कर रहे हैं। 

 

धर्म के पाखंड और ईश्वर के काल्पनिक होने के जितने सुबूत अभी सामने आ रहे हैं, वे फौलादी चट्टान सरीखे मजबूत हैं। अगर धर्म का यही हिंसक सिलसिला कुछ और वक्त जारी रहा, तो हो सकता है कि योरप के विकसित देशों की तरह हिन्दुस्तान जैसे देश में भी लोग धर्म से थक जाएं, और उससे उबर भी जाएं। लोग कहते हैं कि बुरी चीजों का घड़ा जब तक पूरा भरता नहीं है तब तक फूटता नहीं है। आज धार्मिक हिंसा का मामला कुछ ऐसा ही हो रहा है। लोगों को एक-दूसरे के गले काटने की हद तक उकसाने और भडक़ाने वाली धार्मिक साजिशें बहुत से लोगों को यह सोचने पर मजबूर करेंगी कि अगर ईश्वर कहीं होता तो ऐसे लोगों के सिरों पर अपना डंडा क्यों नहीं तोड़ता? आज यह धर्म ही तो है जिसने राजस्थान में शंभूलाल रैगर नाम के एक हमलावर और हिंसक हिन्दू को यह हौसला दिया था कि वह एक मुसलमान मजदूर को जिंदा जलाकर मारे, और इसका वीडियो बनाकर, मुस्लिम को जलाकर मारने का दावा करे, और रैगर के धर्म वाले उसके समर्थन में जुलूस निकालें, अदालत पर धर्म का झंडा फहराएं। पांच बरस पहले के रैगर के ऐसे वीडियो ने अभी इसी हफ्ते उसी राजस्थान में दो मुस्लिमों को उकसाया, और उन्होंने जाकर एक हिन्दू का गला काट दिया क्योंकि उसने मोहम्मद पैगंबर की बेइज्जती के समर्थन में पोस्ट किया था। शंभूलाल रैगर ने तो जिस मुस्लिम मजदूर को जलाकर मारा था, और उसका वीडियो बनाया था, उसने तो किसी ईश्वर का अपमान भी नहीं किया था, उसका जुर्म तो महज मुस्लिम होना था। और ऐसे हत्यारे रैगर के साथ राजस्थान में दसियों हजार हिन्दू खड़े हो गए थे, जिसका इस धरती पर योगदान सिर्फ एक मुस्लिम को जिंदा जलाकर मारना था। 

 

धर्म लोगों को हद से अधिक हिंसक होने का हौसला देता है, उनसे तरह-तरह की हिंसा करवाता है, वह जम्मू में एक मुस्लिम खानाबदोश छोटी सी बच्ची से मंदिर में पुजारी से लेकर पुलिस तक आधा दर्जन हिन्दुओं के किए बलात्कार का शिकार बनाता है, वह ओडिशा में ईसाई धर्मप्रचारक ग्राहम स्टेंस और उनके दो बच्चों को जिंदा जला देने का हौसला देता है, और यह धर्म अपने मानने वालों को यह हौसला भी देता है कि ओडिशा से लेकर गुजरात तक ऐसी धार्मिक हत्याएं करने वाले लोगों का सार्वजनिक अभिनंदन भी करें। आज धर्म दुनिया का सबसे हिंसक हथियार बन चुका है, और जिस तरह आज अमरीका में आम लोग हथियारों  ही थोक में होने वाली हत्याओं को देखकर थक रहे हैं, हो सकता है   दुनिया में समझदार लोगों का  बार तबका धर्म के इस खूनी और जानलेवा रह गए असर से थके, और इससे दूर हो। फिर भी अगर किसी दिन धर्म में गिनती के लोग भी बच जाएंगे, तो उस दिन यह मान लेना ठीक होगा कि धरती पर गिनती में उतने संभावित कातिल बच गए हैं।

 

फातिमा अनवर

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प्रधान संपादक समाचार संपादक
सैफु द्घीन सैफी डॉ मीनू पाण्ड्य
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